Sunday, November 22, 2015

' एक मौका दो खुद को '

क्या कहूँ मेरे ख़्वाब, 
तूं कितना हँसी हैं ?
हाँ, सच है की 
तूं ज़रूरत ही हैं, मेरी 
पर कोई जुर्ररत नहीं है |

आँखों में आज भी, वहीँ सपना हैं......
लेकिन हकीकत और हिम्मत जवाब दें चूँकि
मैं बुरे हालातों की बुराई क्यों करूँ ?
हर किसी ने मुझसे उम्मीद बना रखी होगी
और मैं हर बार उनकी उम्मीदों में 
सही/गलत खोजते नज़र आती हूँ |


खाली हाथ दुआ को उठतें है और 
वहीं आशीर्वाद के लिए भी झुकते है |
नयी शुरुआत, महसूस की जाती है....
सब कुछ नया हीं हैं जो पहुँच में आज नहीं 
उसे पाने की चाह मारी ना हो, 
इसलिए एक मौका दो खुद को |


-- सम्पा बरुआ

9 comments:

  1. आपकी लिखी रचना "पांच लिंकों का आनन्द में" सोमवार 23 नवम्बबर 2015 को लिंक की जाएगी............... http://halchalwith5links.blogspot.in पर आप भी आइएगा ....धन्यवाद!

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  2. achhi kavitayen likhti hain aap. badhia, shubhkamnayen

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  3. सब कुछ नया हीं हैं जो पहुँच में आज नहीं
    उसे पाने की चाह मारी ना हो,
    इसलिए एक मौका दो खुद को |
    ...वाह...बहुत सार्थक चिंतन...एक प्रभावी प्रस्तुति..

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  4. सुन्दर प्रेरक रचना

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