Monday, November 9, 2015

इन खून के थक्को से...

बेइरादा कुछ खताएं, हमसे हो गयी
तो ज़िन्दगी ने भी अब तक साजिश हीं किया
राह में पत्थर, मेरी हरदम दिए
ना हँस सकें खुलकर, ना रो सकें टूटकर |
हम ऐसे ना थे की हमने खुद को मौके ना दिए
कई मौसम दिए तो ज़ख्म और ताज़ा हुए
नए कश्मकश दिया, कई अजनबी दिए,
पर मरहम लगाने का मौके ना दिए |
अगर बेबसी रुला दें मुझें
तो अब आँसू ना बहेंगे ....
मेरा वो वक़्त थम चूका,
इन खून के थक्को से |

-- सम्पा बरुआ 

6 comments:

  1. मोहब्बत के दंगे

    मोहब्बत के दंगे
    ना चले कभी हिन्दुस्तां में नफरत की आंधी यारो
    फैला दो हर घर शहर शहर यह मोहब्बत के दंगे

    ना हो टुकड़े हिन्द के ना मिटे यहाँ भाईचारा यारो
    मिटाकर कर नफरतें सारी अपनालो मोहब्बत के दंगे

    जब भी बढे योगियों जोगियों के कदम इधर को यारो
    दिखा दो इनको अब जो यहाँ चल पड़े मोहब्बत के दंगे

    कभी मिटा ना सके कोई अपनी प्यार भरी हस्ती यारो
    मोहब्बत ही मोहब्बत हो हर तरफ मोहब्बत के दंगे

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  2. क्या बात है !.....बेहद खूबसूरत रचना....
    आप को दीपावली की बहुत बहुत शुभकामनाएं...
    नयी पोस्ट@आओ देखें मुहब्बत का सपना(एक प्यार भरा नगमा)

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