Friday, July 6, 2012

ना उम्मीदी की रात छोड़ ...


बादलों में मोती खोजने चले है , 
ना उम्मीदी की रात छोड़ ...
हँसते- मुस्कुराते नयी सुबह को ,
तलाशते , थोड़ा घबराते चले है | 


शबद हो चुकी , जिन्दगी में ..
क्या बदलेगी ?? बस एक सवाल है ...
पर जब भी सोचते है ...एक डर सा लगता है ,
नया क्या खोजूं ?? जब कुछ नया नहीं है |


दुनिया के सन्नाटो से ,
छेड़ - छाड़ अब नहीं ...??
सिर्फ ख़ुशी की चाहत में ,
अनसुनी आवाज अब नहीं .. |


जो मिला था , क्या कम था ??
जो नयी शुरुआत चाहिए ....
जिन्दगी की गाड़ी छुट चुकी ,
उसे दौड़ कर पकड़ने से अच्छा है  ..
कुछ देर रुक, दूसरी ट्रेन का इंतजार कर ले |


4 comments:

  1. apni ek book print karba kar mujhe bhi bhej dena............

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  2. वाह ,,, बहुत सुंदर अभिव्यक्ति,,,सुंदर रचना ,,,,

    RECENT POST...: दोहे,,,,

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  3. जो मिला था , क्या कम था ??
    जो नयी शुरुआत चाहिए ....

    क्या शानदार प्रश्न है!!

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