Sunday, July 8, 2012

हर राह पर, कुछ कह रही ....

यादों की राख से , 
जाने क्या अब पाये |
बावरे थे , हम ...
जो जिन्दगी को ...
अब तक समझ ना |

हर राह पर, कुछ कह रही थी , 
जो रुके है , अब ...
तो सोचे किस दिशा में है |

ना सोचो दुखी है , अफसोस का सफ़र ..
अब .... ना चाहते  हुए  भी  ख़त्म हुआ |

अब समझ चुके है की कमी ,
बस जिन्दगी की साथी है ...
हर चाह के साथ नयी हो जाती है |

4 comments:

  1. अब समझ चुके है की कमी ,
    बस जिन्दगी की साथी है ...
    हर चाह के साथ नयी हो जाती है |

    बहुत बढ़िया प्रस्तुति,,,,,

    RECENT POST...: दोहे,,,,

    ReplyDelete
  2. अब समझ चुके है की कमी ,
    बस जिन्दगी की साथी है ...
    हर चाह के साथ नयी हो जाती है |

    ReplyDelete