Monday, June 16, 2014

चादरों का शोक

वो सुबह ना आयी , 
ना आयी वो शाम ..
मोहोब्बत की यादें भी ...
ना दे पायी , कुछ आराम |

हम तो ग़मों के चादरों को , 
लपेटते हीं उलझे हैं , 
पता नहीं कैसे ...??
जिन्दगी की तकलीफे ने ....
उलझे रेशो की जगह ले ली ... |

अब जो सोचते है ....
चादरों का शोक, 

क्यों पाला था ??

आज जो उलझे हुए है , 
" बिना बुने ..."
इन तकलीफ देने वाले ग़मों में ,
और जब भी छुटना चाहते है ,
तो पुरानी चादरों में ही ,
क्यों बार- बार उलझ जाते है ??

6 comments:

  1. इन तकलीफ देने वाले ग़मों में ,
    और जब भी छुटना चाहते है ,
    तो पुरानी चादरों में ही ,
    क्यों बार- बार उलझ जाते है ??

    बिल्‍कुल सही कहा आपने ... बहुत ही अच्‍छी प्रस्‍तुति।

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    1. धन्यवाद संजय भास्‍कर ज़ी |

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  2. अब समझ में आया घर में समय समय पर चादरें बदल क्यों दी जाती हैं ।

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    1. धन्यवाद सुशील कुमार जोशी ज़ी |

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  3. अच्छी पंक्तियां

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    1. धन्यवाद sushil bhole ज़ी |

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