Thursday, June 5, 2014

मुझें अमरत्व की चाह है

सेठ बने है, जब फ़िक्र में थे तो लामलेट हो रहें थे |
जिसके भाग्य में लिखा वो बेफिकर होकर झेले...
हमें तो इन्तजार है उस सूरज का ,
जो चमके मेरे प्रताप से ......
और मैं उसकी परछाई में खोकर, 
हर्षित हूँ लेकिन उसमें मैं कहीं, ना हूँ ...|

जो मदत-मदत कह रहा ,
उसके हाथ खुले है, उपकार को |
भय भीतर खा रहा ,
फिर भी उसे तो रोटी मिल बांटकर है, खानी |


झूट का भार कमर तोड़ रहा 
लेकिन झूटे धन की चाह उसे नहीं....|
अभय मुर्ख, सत्य के अर्थ तलाशने को निकला है... |

कर्म की महत्ता से परिचित है, 
उससे सत्य कहता है |
उसे आभास नहीं है, 

मैं किस दिशा में हूँ ??

अगर वो मुझसे 
कठिन- कठोर परिश्रम मांगेगी,
तो और आगे बढ चलूँगा,
मुझें अमरत्व की चाह है

 " अपने कर्मों से प्रप्ति संभव " |


5 comments:

  1. आपकी लिखी रचना शनिवार 07 जून 2014 को लिंक की जाएगी...............
    http://nayi-purani-halchal.blogspot.in आप भी आइएगा ....धन्यवाद!

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  2. बहुत सुन्दर प्रस्तुति।
    --
    आपकी इस' प्रविष्टि् की चर्चा कल शनिवार (07-06-2014) को ""लेखक बेचारा क्या करे?" (चर्चा मंच-1636) पर भी होगी!
    --
    हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
    सादर...!
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक

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  3. मुझें अमरत्व की चाह है
    जानू बरुआ जी आपकी इस रचना को कवितामंच ब्लॉग पर साँझा किया गया है

    संजय भास्कर
    http://kavita-manch.blogspot.in

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  4. मुझें अमरत्व की चाह है
    जानू बरुआ जी आपकी इस रचना को हमारा हरयाणा ब्लॉग पर साँझा किया गया है

    संजय भास्कर
    http://bloggersofharyana.blogspot.in

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