Friday, June 20, 2014

फरेब करते, फ़रेबी से

तेरी सदाओ का अब ये असर है 
बेअसर हो रहीं है मेरी हर फ़रियाद...
इब ना होगा उनकों मुझ पर यकीन
जिसे जाना था ...वो कब का छोड़ गये |

पर कैसे ?? भूल जाऊँ उन यादों को ,
भोली बातों को, अनजान ख्वाइशों को ...
किस बात की हया मुझकों ?? 

फक्र है अपने वजूद पर... |

आखिर मौत ही तो , अंतिम सबक है, 
जिसे जल्द सीखने की चाह नहीं, मुझकों |

जो बनना चाह था ,ख्वाब किसी का |
तो आज खाक ...बनकर रह गये ||

मलाल जिन्दगी से नहीं
ना कई वजह तलाश्तें है ...
पर उस फरेब करते, फ़रेबी से 

हमें सच्ची मोहोब्बत थी |



18 comments:

  1. ऐसे फरेबी को भूल ही जाएँ ..... सुन्दर लिखा है

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  2. आखिर मौत ही तो , अंतिम सबक है,
    जिसे जल्द सीखने की चाह नहीं, मुझकों |
    गहन अभिव्यक्ति .... !!

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  3. जो बनना चाह था ,ख्वाब किसी का |
    तो आज खाक ...बनकर रह गये ||

    ....बहुत ही उम्दा लेखन है एक अच्छी कविता के लिए बधाई |

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  4. ओह …….
    मार्मिक अभिव्यक्ति !

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  5. जो बनना चाह था ,ख्वाब किसी का |
    तो आज खाक ...बनकर रह गये ||
    … सच जब ख्वाब खाक होकर काली गहरी रात बनती है तो लगता है अब जीवन में कुछ नहीं बचा …लेकिन दुनिया उम्मीद पर कायम है। . धुप अँधेरा है तो उसके बाद उजाला भी जरूर होना है।
    बहुत बढ़िया

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  6. हम न समझे थे बात इतनी सी
    ख्वाब शीशे के दुनिया पत्थर की
    बहोत अच्छा लिखा है

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  7. बहुत भावपूर्ण और मर्मस्पर्शी रचना...

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  8. बहुत सुन्दर प्रस्तुति।
    --
    आपकी इस' प्रविष्टि् की चर्चा कल jरविवार (22-06-2014) को "आओ हिंदी बोलें" (चर्चा मंच 1651) पर भी होगी!
    --
    हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
    सादर...!
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक

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  9. सुंदर रचना , बेहतरीन शब्दों से श्रंगित , आ. धन्यवाद !
    I.A.S.I.H - ( हिंदी में समस्त प्रकार की जानकारियाँ )

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