Friday, June 13, 2014

मायूसी - मासूमियत से ढकते है

ये क्या हुआ है मुझकों ?? 
सच कहूँ , ऐसा तो कुछ भी नहीं |
जैसे पहले थे-वैसे हीं, आज भी जि रहें है |
सुबह पहले - पहल उठते है, सबसे ख़ुशी से मिलते है ...
अपनी मायूसी - मासूमियत से ढकते है |
जब मौका मिलें तो, दिल खोलकर हँसते है |

मेरे हँसते हुए चेहरे से , 
इत्तेफाक कोई ना रखें तो क्या ??
हँसकर कहते है, कुछ गिर-गया है शायद |
सुबह से देखों आँखें लाल-लाल हो रहीं है ...|

पता नहीं ये कब तक चुभेगा, 
सोचती हूँ आँखें हीं बंदकर लूँ , 
तो दर्द भी कम हो जायेगा |
सच है समय के साथ चल चुकें है ,
नहीं रुकें है, किसी के इंतजार में |

जिन्दगी में बहुत से झटके आयें
पर इन झटकों का हिसाब कभी किया नहीं ...
लेकिन आज उन झटकों को याद करने लगें, जब |

तो सबने बारी-बारी कहा, 
अब हमारी याद कैसे आ गयी ??
हमनें तो तुझें इतना ज्यादा दर्द कभी दिया नहीं |
आज तूं इतनी बेबश कैसे हो गयी ?? 
जो हमसें ज़हर मांगने आयी है |

चली जा यहाँ से हमें नीचा ना कर,
तूं चाहती है जो दर्द ...
वो हम चाहकर भी ना देंगे |
तेरी सज़ा यहीं है जब तक ज़ी रहीं है, 
उसें याद करना ??
तब तेरी दवा और दर्द साथ-साथ होगा |

8 comments:

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    1. डॉ. मोनिका शर्मा ज़ी धन्यवाद |

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    1. सुशील कुमार जोशी ज़ी धन्यवाद |

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  3. bahut sundar rachnayen hain aapke blog kee . dhanywaad aapke comment hetu !!

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    1. धन्यवाद PITAMBER DUTT SHARMA ज़ी |

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  4. बहुत सुन्दर....बहुत कोमल भाव...

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    1. धन्यवाद संजय भास्‍कर ज़ी |

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