Tuesday, June 17, 2014

इंसानियत का कीमा

बेहद कम शब्द है , पास 
पर जो समझा दुनिया को ,
अगर समझा पाये कभी ,
तो गागर में सागर ही होगा |

लिया... एक्साम्प्ल कीमे का , 
जिस जानवर का निकालों ...
सभी का बन जाता है ...

पर हमने तो इंसानियत का कीमा देखा है ...
मैं अगर अब इन्सान को जानवर कह दूँ ,
तो ये जानवरों के वजूद से नाइंसाफी ही होगी |
अब तो इंसानियत जानवरों में दिखती है

 -- लाचारी , बेबसी ..में
और मनुष्य कीड़े - मकोडो सा 

हर जगह फैला सा लगता है  |

जो कमजोर होता है , 
ताकतवर के पैरों तले कुचला जाता है....
और एक सच ये भी है , 

ताकतवर बनने के लिए ...
कुचलना भी जरुरी हो जाता है |

4 comments:

  1. ब्लॉग बुलेटिन की आज की बुलेटिन बच्चे और हम - ब्लॉग बुलेटिन मे आपकी पोस्ट को भी शामिल किया गया है ... सादर आभार !

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  2. बहुत खूबसूरत अहसास समेटे ये पोस्ट लाजवाब है |

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    1. धन्यवाद संजय भास्‍कर ज़ी |

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