Saturday, June 7, 2014

खुद को जाने दो कदम चलकर

हर दिन नया, हर पल अबूझ पहेली सा,
अनजान खुशियाँ पीछा ना करती हों, हमारा |
पर हतासा के काले डराने वाले बादल,
उम्मीदों की रौशनी को बाधित कर छाये रहते है |
कोई भी सुखद फैसला, होसला बुलंद कर जाता है
पर मजबूत नींव के अभाव में इमारत अब गिरी-तब गिरी |
जो भी हो सब साफ, जैसे पहले कुछ हुआ नहीं या किया नहीं ...
कोशिशों को याद कर कोई ख़ुशी नहीं मिलती, आदर्श भी फिसड्डी |
लेकिन तब आप अपने कमजोर पक्ष को स्वीकार करते है,
अब बात आपकी क्षमता और अनुभव के बेहतर उपयोग से है |
निश्चितता के आसार है, सफलता भी समभवत् है ...
बस ये रंगीन सपने नहीं हक्कित है, जो टूटते नहीं |
हार पर तीव्र इच्छा रूपी बालू से निर्मित होते है ....
जो चाहा मिलें संभव नहीं पर चाहत कोई भी छोटी नहीं होती |
मानव सुपरमैंन नहीं वो अपने चुनाव पर निर्भर है..
खुद को जाने दो कदम चलकर, आप अपनी रफ़्तार जान सकते है |
दुनिया से झूट कहते रहना मज़बूरी हो सकती है और खुद से झूट बेवकूफी ||

6 comments:

  1. बहुत सुन्दर प्रस्तुति।
    --
    आपकी इस' प्रविष्टि् की चर्चा कल सोमवार (09-06-2014) को "यह किसका प्रेम है बोलो" (चर्चा मंच-1638) पर भी होगी!
    --
    हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
    सादर...!
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक

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  2. हृदयस्पर्शी कविता.बधाई

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    1. धन्यवाद संजय भास्‍कर ज़ी |

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