Friday, June 13, 2014

आखिर तुम तन्हा क्यों हो ??

तुम्हें दें उस मोहोब्बत की कसम,
जिसमें तुम थे, हम थे 
और थी ये दुनिया " चुप " |
ओ सनम यूँ तो आज भी 
तेरी हर यादें बोलती है, 
पर इस बेरहम दुनिया से 
जो उन्हें छुपाना पड़ता है |

तो तन्हाई में, उन्हें 
अपना हाले-दिल बताना ...
मुश्किल-ब-मुश्किल 
होता चला जाता है |


यूँ रो-कर कभी-भी अपनी बात 
पूरी की नहीं जा सकती,
इसलियें मासूमियत को दफन कर 
मुस्कुराना पड़ता है |

यूँ तो खफा हूँ, तेरे बेरुखी पर,

 फिर भी खोफ ना खाना...
अपनी अनजानी भूल के लिए, 

मैं आज कुछ यूँ शर्मिंदा हूँ !!

पता नहीं, तुझसे बिछड़कर 
अब तक कैसे जिन्दा हूँ ??

मिलकर बिछड़ने का दस्तूर पुराना है,
ना तुम अपनी खूबियों पर मगरूर हो |
तो क्या कोई मेरा ऐब, इसकी वजह है ??

जो हो सच कह दो, 

अब तो इन्तहा हो रहीं है |
तुम्हारी भी तन्हाई मुझें ...
तुम तक आने को मजबूर करती है |
आखिर तुम तन्हा क्यों हो ??

12 comments:

  1. बहुत सुन्दर प्रस्तुति।
    --
    आपकी इस' प्रविष्टि् की चर्चा कल शनिवार (14-06-2014) को "इंतज़ार का ज़ायका" (चर्चा मंच-1643) पर भी होगी!
    --
    हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
    सादर...!
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक

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    1. धन्यवाद रूपचन्द्र शास्त्री मयंक ज़ी |

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  2. विरह से ओत प्रोत होने के साथ ही मार्मिकता भी । बहुत सुन्दर रचना आभार के साथ बधाई ।

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    1. धन्यवाद Naveen Mani Tripathi ज़ी |

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    1. Onkar ज़ी धन्यवाद |

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  4. या इलाही ये माज़रा क्या है...

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    1. धन्यवाद Vaanbhatt ज़ी |

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  5. पता नहीं, तुझसे बिछड़कर
    अब तक कैसे जिन्दा हूँ ??
    बेहतर रचना

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    1. धन्यवाद dr.mahendrag ज़ी |

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    1. धन्यवाद संजय भास्‍कर ज़ी |

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