Monday, December 5, 2011

अब मैं एक कट पुतली सी हो गयी हु.....

जिस दिल को प्यार से भरा था, हमने |
उसमे दर्द ने जगह छिनकर लेली ||
यु तो सब कुछ मिल गया, जो खोया था |||
बस तुझे वापस पाने की, राह नहीं मिली ||||

यु तो अब मैं एक कट पुतली सी हो गयी हु |
जिसकी डोर किसी ने सब जान -बुझकर तोड़ दी ||
पर अब उस डोर को थामने वाला, कोई नहीं है |||
खुश रहू तो रहू .....किसके लिए ||||
जब खुश रहने की, कोई वजा ही नहीं है |||||

अब तो मैं पेड़ से टूटे लावारिश पत्ते की तरह हु |
जो बस यहाँ से वहाँ उड़ती ही जा रही है ||
ना तो उसके पास हवा के छोको का सहारा है |||
ना ही कोई मंजली जिस और उसे उड़कर जाना है ||||

5 comments:

  1. क्‍या बात है.....

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  2. aap bahut dard bhara likhatee hain. Jindagee bahut khoobsurat hain Pointji.......satrangee..inderdhanushi.....baaki aap bahut baddiya likhatee hain...........nice one.

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